🔥 बिहार में भ्रष्टाचार की असली सच्चाई: राशन से लेकर अस्पताल और सरकारी योजनाओं तक का कड़वा सच
1️⃣ सोशल मीडिया पर वायरल राशन वीडियो की सच्चाई
आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि राशन डीलर उपभोक्ताओं को कम राशन दे रहा है। लेकिन सच यह है कि यह कोई नई बात नहीं है।
बिहार में राशन में कटौती आज से नहीं, बल्कि तब से चल रही है जब से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) लागू हुई। यहाँ हालात यह हैं कि एक आदमी के हिस्से का कम से कम एक किलो राशन पहले से ही काट लिया जाता है।
कई जगहों पर तो तराजू ही पहले से गड़बड़ होता है — यानी वजन मापने के सिस्टम में ही धोखाधड़ी सेट होती है।
2️⃣ कैमरा निकलते ही डीलर क्यों सुधर जाता है?
जब कोई आम आदमी वीडियो बनाना शुरू करता है, तभी राशन डीलर का व्यवहार अचानक बदल जाता है।
वह सही वजन देने लगता है, सही तरीके से बात करने लगता है।
लेकिन जैसे ही कैमरा बंद होता है, वही पुरानी मनमानी।
कई बार तो वीडियो बनाने पर डीलर गाली-गलौज और हाथापाई तक पर उतर आता है।
सवाल यह नहीं है कि वीडियो क्यों बनाया जा रहा है।
सवाल यह है कि बिना वीडियो बनाए जनता को उनका हक क्यों नहीं मिलता?
3️⃣ बिहार में भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं, आम बात बन चुका है
सच्चाई यह है कि बिहार में भ्रष्टाचार जल्दी खत्म होने वाला नहीं है।
यहाँ ऐसा कोई विभाग नहीं बचा जहाँ घपलेबाज़ी न हो।
अगर आपको अपने ब्लॉक में कोई भी काम करवाना है, तो बिना पैसा दिए कुछ नहीं होता:
- जन्म प्रमाण पत्र
- आवासीय प्रमाण पत्र
- जाति प्रमाण पत्र
- मृत्यु प्रमाण पत्र
4️⃣ ऑनलाइन आवेदन भी बेकार, जब तक पैसा न दो
सरकार कहती है कि सब कुछ ऑनलाइन कर दिया गया है।
लेकिन हकीकत यह है कि अगर आप ऑनलाइन आवेदन भी कर देते हैं, तो आपका फॉर्म बार-बार रिजेक्ट कर दिया जाता है।
क्यों?
क्योंकि नीचे बैठा कर्मचारी बिना पैसा लिए साइन नहीं करता।
जैसे ही “खर्चा-पानी” दिया जाता है,
वही आवेदन मिनटों में पास हो जाता है।
यह ऑनलाइन सिस्टम नहीं है,
यह ऑनलाइन दिखने वाला ऑफलाइन भ्रष्टाचार है।
5️⃣ सरकारी अस्पताल और गरीब की मजबूरी
सरकारी अस्पताल गरीब आदमी की आख़िरी उम्मीद होता है।
अगर उसके पास पैसा होता, तो वह प्राइवेट अस्पताल क्यों जाता?
लेकिन अस्पताल में यही कहा जाता है:
“दवा स्टॉक में नहीं है, बाहर से ले आइए।”
हैरानी की बात यह है कि वही दवा अस्पताल के बाहर आसानी से मिल जाती है।
यानी डॉक्टर और मेडिकल स्टोर के बीच साफ-साफ सेटिंग।
यह इलाज नहीं,
गरीब की मजबूरी से कमाई है।
6️⃣ हम BJP समर्थक हैं, लेकिन अंधभक्त नहीं
यह कहना ज़रूरी है कि हम BJP समर्थक हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हम गलत को गलत नहीं कहेंगे।
यह सच है कि:
- पहले के मुकाबले कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ है
- बिहार अब पहले जैसा असुरक्षित नहीं है
- बेटियाँ आज ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं
लेकिन यह भी सच है कि:
सरकार होने के बावजूद घोटाले, घपले और भ्रष्टाचार जारी हैं।
यह सिर्फ कांग्रेस के समय की समस्या नहीं थी,
यह आज भी ज़मीनी स्तर पर मौजूद है।
7️⃣ प्रधानमंत्री आवास योजना और असली गरीब की अनदेखी
गाँवों में प्रधानमंत्री आवास या इंदिरा आवास योजना में भी भारी धांधली होती है।
हकीकत यह है:
- जिनके पास पहले से पक्का घर है
- जिनके पास ज़मीन है
वही लोग “गरीब” दिखाकर योजना का पैसा उठा रहे हैं।
आज लगभग 1.5 लाख रुपये की राशि आती है,
जिसमें से कम से कम 20,000 रुपये कमीशन में कट जाते हैं।
असली गरीब सिर्फ फोटो में इस्तेमाल होता है।
8️⃣ मुखिया, सरपंच और योजनाओं का खुला खेल
गाँव का मुखिया या सरपंच भी इसमें शामिल होता है:
- मनरेगा घोटाला
- मिट्टी घोटाला
- पोखर निर्माण घोटाला
हर योजना सिर्फ कागज़ पर पूरी होती है।
ज़मीन पर काम कम,
कमीशन ज़्यादा।
9️⃣ यह सिर्फ बिहार की कहानी नहीं
यह कहना गलत होगा कि यह सिर्फ बिहार में ही होता है।
बिहार से बाहर भी हमने यही हालात देखे हैं।
फर्क बस इतना है कि:
- कहीं खुलकर होता है
- कहीं थोड़ा छुपकर
लेकिन सिस्टम लगभग एक जैसा है।
🔚 निष्कर्ष: सच्चाई कड़वी है, लेकिन ज़रूरी है
आज हालत यह है कि भ्रष्टाचार इतना सामान्य हो गया है कि लोग उसे “सेटिंग” कहने लगे हैं।
जब तक:
- ईमानदार को सुरक्षा नहीं मिलेगी
- घूस लेने वाले को तुरंत सज़ा नहीं मिलेगी
- और जनता डर के बजाय सवाल नहीं करेगी
तब तक हालात बदलने मुश्किल हैं।
जय श्री राम कहना आस्था है,
लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना ज़िम्मेदारी है।